प्राकृत और मुक्तक— कवि
Author(s): दीप्ति विष्णु
Abstract: भारतवर्ष की इस पुण्यभूमि में आस्तिक, नास्तिक, वैदिक, अवैदिक, ईश्वरवादी, अनीश्वरवादी आदि सभी परस्पर अविरूद्ध विचार रखने वाले एक दूसरे को कष्ट दिए बिना फलते-फूलते और वृद्धि पाते रहे हैं और एक ही कुटुम्ब में वैदिक, बौद्ध व जैन धर्म एक साथ अपना अस्तित्व बनाए हुए है। मतविभिन्नता के कारण यहां के लोग किसी से द्वेष या वैर नहीं करते, बल्कि दूसरों को आदर की दृष्टि से देखते है। यही कारण है कि यहां चार्वाक-दर्शन के प्रणेता ‘महर्षि’ के महत्वसूचक पद से सत्कृत किए गये हैं और वेदविरोधी भगवान् ऋषभदेव तथा बुद्धदेव ‘अवतार’ माने गए हैं। संस्कृत व पालि भाषाओं के समान ही प्राकृत भाषा में भी ई0पू0 छठीं शताब्दी से 1800 ई0 सन् तक विपुल साहित्य का निर्माण हुआ जिस प्रकार संस्कृत में वैदिक धर्म से सम्बद्ध आचारशास्त्र, धर्मशास्त्र, काव्य, व्याकरणादि विधाओं पर विशाल वाङ्मय का निर्माण हुआ, जिस प्रकार पालि में बौद्ध धर्म से सम्बन्धित पिटकों, अट्ठकथाओं व थेरवादी ग्रन्थों का निर्माण हुआ‚ उसी प्रकार जैन धर्म से सम्बद्ध आगमग्रन्थों (लगभग 46 ग्रन्थों), काव्यों, भाष्य चूर्णी व व्याकरणादि ग्रंथों का प्रणयन प्राकृत भाषा में किया गया। प्राकृत साहित्य को धर्माश्रय के साथ-2 राज्याश्रय व लोकाश्रय भी प्राप्त था। इस साहित्य में जनसाधारण की भावनाएं बहुशः अभिव्यक्त हुई हैं। प्राकृत भाषा का गाथासप्तशती आदि मुक्तक काव्य काम- कला के तत्त्व दर्शन (रहस्य) को गोदावरी, नर्मदा, रेवा परिसर के पहाड़ी ग्रामों अर्थात एक विशेष भूमि खंड और वहां के निवासियों का स्वच्छंद जीवन दर्शन है। कालांतर में यह गाथाएं संस्कृतच्छाया में रूपांतरित होकर समूचे देश में पढ़ी गई। राजशेखर ने कर्पूर मंजरी और धन्यालोक के प्रथम उद्योत में इन गाथाओं को खूब उद्धृत किया गया।
Keywords: प्राकृत‚ जनसामान्य‚ व्यड्ग्यार्थ‚ जन–जीवन‚ मुक्तक‚ काव्य
