21वीं सदी में न्यायिक सक्रियता: एक आलोचनात्मक विश्लेषण
Author(s): अरुण कुमार वर्मा एवं अभय तिवारी
Abstract: 21वीं सदी में भारतीय न्यायपालिका की भूमिका में गुणात्मक परिवर्तन देखने को मिला है, जहाँ न्यायिक सक्रियता पारंपरिक न्यायिक समीक्षा की सीमाओं से आगे बढ़कर शासनात्मक हस्तक्षेप का रूप ले चुकी है। मौलिक अधिकारों की रक्षा, विधायी निष्क्रियता और प्रशासनिक विफलताओं की पृष्ठभूमि में न्यायपालिका ने स्वयं को प्रायः लोकतंत्र का अंतिम संरक्षक के रूप में प्रस्तुत किया है। लेकिन न्यायपालिका कीइस सक्रिय भूमिका ने शक्तियों के पृथक्करण, लोकतांत्रिक जवाबदेही और संस्थागत संतुलन से संबंधित गंभीर संवैधानिक प्रश्न भी उत्पन्न किए हैं।यह शोध-लेख 21वीं सदी में भारतीय न्यायिक सक्रियता की प्रकृति, विस्तार और प्रभाव का आलोचनात्मक विश्लेषण करता है। अध्ययन का केंद्रीय तर्क यह है कि समकालीन न्यायिक सक्रियता अब केवल अधिकारों की रक्षा तक सीमित न रहकर नीति-निर्माण और प्रशासनिक नियंत्रण की दिशा में अग्रसर हो गई है, जिससे न्यायिक समीक्षा और शासन के बीच की संवैधानिक रेखा धुंधली होती जा रही है। लेख में शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत, जनहित याचिका, न्यायिक समीक्षा और संस्थागत क्षमता जैसे सैद्धांतिक ढाँचों के माध्यम से न्यायिक सक्रियता का परीक्षण किया गया है। यह अध्ययन यह निष्कर्ष प्रस्तुत करता है कि यद्यपि न्यायिक सक्रियता ने कई मामलों में शासन की विफलताओं को भरने और संवैधानिक मूल्यों को सशक्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, परंतु इसकी असीमित प्रवृत्ति लोकतांत्रिक शासन के लिए उतनी ही चुनौतीपूर्ण हो सकती है। अतः लेख एक संतुलित, सीमाबद्ध और संवैधानिक रूप से उत्तरदायी न्यायिक सक्रियता की आवश्यकता पर बल देता है।
Keywords: न्यायिक सक्रियता,शक्ति पृथक्करण, ,लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व, जनहित याचिका, न्यायिक अतिक्रमण, भारतीय संविधान।
